Geography
class-10 BIHAR BOARD CHAPTER-1
भूगोल की परिभाषा- समाजिक विज्ञान का वह शाखा जिसके अन्नतर्गत
मानव एवं पर्यावरण के बीच के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है। भूगोल को व्यवस्थित करने का श्रेय युनानियों को कहा जाता है। सर्वप्रथम
हिकेटियस ने सर्वप्रथम अपनी पुस्तक “जस पेरियोड्स”
में भौगोलिक तत्वों की समावेश करने का प्रयास किया था। इसलिए इसे
भूगोल का जनक माना जाता है।
भूगोल से संबंधित महत्वपूर्ण व्यक्तियों का योगदान निम्नलिखित है:–
भूगोल का जनक – हिकेटियस
गणितिय भूगोल का जनक – थेल्स
सांस्कृतिक भूगोल का जनक – कार्ल-ओं सॉंवर
आधुनिक भूगोल का जनक – अलक्जेंडर
वॉन हम्बोल्ट
भौगोलिक भूगोल का जनक – पोलिडोनियम
विश्व ग्लोब निर्माता – मार्टिन बीहम
विश्व मानचित्र का निर्माता – अनेक्जीमेंडर
1. संसाधन एवं विकास
संसाधन :- हमारे पर्यावरण में उपलब्ध
प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और
जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है जो आर्थिक रूप से संभाव्य और
सांस्कृतिक रूप से मान्य है संसाधन कहलाती है ।
संसाधनों का वर्गीकरण
:-
उत्पत्ति के आधार पर :- जैव और अजैव
समाप्यता के आधार पर :- नवीकरण योग्य और अनवीकरण
योग्य
स्वामित्व के आधार पर
:- व्यक्तिगत
, सामुदायिक , राष्ट्रीय और
अंतर्राष्ट्रीय
विकास के स्तर के आधार
पर :- संभावी , संभावी विकसित भंडार और संचित कोष
उत्पत्ति
के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण :-
जैव संसाधन :- ऐसे संसाधन जो हमें जीवमंडल
से प्राप्त होते हैं , एवं जिनमें जीवन है जैव संसाधन कहलाते
हैं । जैसे :- मनुष्य
, प्राणीजात आदि ।
अजैव संसाधन :- वे सभी संसाधन जो निर्जीव
वस्तुओं से बने हैं , अजैव संसाधन कहलाते हैं । जैसे :- चट्टानें और धातुएं ।
समाप्यता के आधार पर
संसाधनों का वर्गीकरण :-
नवीकरणीय संसाधन :- वे संसाधन जिन्हें विभिन्न
भौतिक , रासयनिक अथवा यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनः
उपयोगी बनाया जा सकता है , नवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं । जैसे :- वायु , जल
आदि ।
अनवीकरणीय संसाधन :- वे संसाधन जिन्हें एक बार उपयोग में लाने के बाद
पुन : उपयोग में नहीं लाया जा सकता , इनका निर्माण एवं विकास एक लंबे भूवैज्ञानिक
अंतराल में हुआ है , अनवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं । जैसे :- खनिज ।
स्वामित्व के आधार पर
संसाधनों का वर्गीकरण :-
व्यक्तिगत संसाधन :- वैसे संसाधन व्यकतिगत
संसाधन कहलाते हैं जिनका स्वामित्व निजी व्यक्तियों के पास होता है । उदाहरण :-
किसी किसान की जमीन , घर , आदि ।
सामुदायिक संसाधन :- वे संसाधन जिनका उपयोग समुदाय के सभी लोग करते
हैं , सामुदायिक संसाधन कहलाते हैं ।
राष्ट्रीय संसाधन :- किसी भी प्रकार के संसाधन जो राष्ट्र की
भौगोलिक सीमा के भीतर मौजूद हों , राष्ट्रीय संसाधन कहलाते
हैं ।
अंतर्राष्ट्रीय संसाधन :- तट रेखा के 200 मील दूरी
से परे खुले महासागरीय संसाधनों पर किसी देश का अधिकार नहीं है । यह
अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की निगरानी में हैं । इन्हें अंतर्राष्ट्रीय संसाधन कहते
हैं ।
विकास के स्तर के आधर
पर संसाधनों का वर्गीकरण :-
संभावी संसाधन :- वे संसाधन जो किसी प्रदेश में विद्यमान हैं ,
परंतु उनका उपयोग नहीं किया गया है संभावी संसाधन कहलाते हैं ।
विकसित संसाधन :- वे संसाधन जिनके उपयोग की गुणवत्ता और मात्रा
निर्धारित की जा चुकी है विकसित संसाधन कहलाते हैं ।
भंडारित संसाधन :- पर्यावरण में उपलब्ध वे संसाधन जो अभी
प्रौद्योगिकी के अभाव में मानव की पहुंच से बाहर हैं भंडारित संसाधन कहलाते हैं ।
संचित संसाधन :- वे संसाधन जिन्हें अभी तकनीकी ज्ञान के उपयोग
से प्रयोग में लाया जा सकता है , परंतु इनका उपयोग अभी आरंभ
नहीं हुआ है संचित संसाधन कहलाते है ।
संसाधनों का विकास :-
मानव अस्तित्व के लिए संसाधन
अत्यन्त महत्वपूर्ण है । ऐसा विश्वास किया जाता था कि संसाधन प्रकृति की देन है
इसलिए मानव द्वारा इसका अंधाधुंध उपयोग किया गया जिसके फलस्वरूप निम्नलिखित मुख्य
समस्याएँ पैदा हो गयी हैं ।
कुछ व्यक्तियों के
लालचवश संसाधनों का ह्रास ।
संसाधन समाज के कुछ ही
लोगों के हाथ में आ गए हैं ,
जिससे समाज दो हिस्सों संसाधन संपन्न एवं संसाधनहीन अर्थात् अमीर और
गरीब में बँट गया ।
संसाधनों के अंधाधुंध
शोषण से वैश्विक पारिस्थितिकी संकट पैदा हो गया है जैसे :- भूमंडलीय तापन , ओजोन परत अवक्षय , पर्यावरण प्रदूषण और भूमि निम्नीकरण आदि हैं ।
मानव
जीवन की गुणवत्ता और वैश्विक शांति के लिए समाज में संसाधनों का न्यायसंगत बँटवारा
आवश्यक हो गया है ।
सतत्
पोषणीय विकास :- संसाधनों का ऐसा विवेकपूर्ण प्रयोग ताकि न केवल वर्तमान पीढ़ी की अपितु
भावी पीढ़ियों की आवश्यकताएं भी पूरी होती रहें , सतत्
पोषणीय विकास कहलाता है ।
एजेंडा 21 :- 1992 में ब्राजील के शहर रियो डी जेनेरो में
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन के तत्वाधान में राष्ट्राध्यक्षों ने
एजेंडा 21 पारित किया ।
उद्देश्य
:-जिसका उद्देश्य समान
हितों , पारस्परिक
आवश्यकताओं एवं सम्मिलित जिम्मेदारियों के अनुसार विश्व सहयोग के द्वारा पर्यावणीय
क्षति , गरीबी और रोगों से निपटना है ।
संसाधन नियोजन :- ऐसे उपाय अथवा तकनीक जिसके द्वारा संसाधनों का
उचित उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है संसाधन नियोजन कहलाता है ।
भारत में संसाधन नियोजन
:- संसाधनों की मदद से
समुचित विकास करने के लिये यह जरूरी है कि योजना बनाते समय टेक्नॉलोजी , कौशल और संस्थागत बातों का
ध्यान रखा जाये ।
प्रथम
पंचवर्षीय योजना से ही भारत में संसाधन नियोजन एक प्रमुख लक्ष्य रहा है ।
भारत में संसाधन नियोजन
के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं :-
पूरे देश के विभिन्न
प्रदेशों के संसाधनों की पहचान कर उनकी तालिका बनाना ।
उपयुक कौशल , टेक्नॉलोजी और संस्थागत ढाँचे
का सही इस्तेमाल करते हुए नियोजन ढाँचा तैयार करना ।
संसाधन नियोजन और विकास
नियोजन के बीच सही तालमेल बैठाना ।
संसाधन संरक्षण :-
संसाधनों
का उचित प्रबंधन ताकि जल , भूमि तथा – वनस्पति
एवं मृदा का इस प्रकार से प्रयोग करना कि भावी पीढ़ी की जरूरतों का भी ख्याल रखा
जाए ।
नोट- महत्वपूर्ण सम्मेलन पर्यावरण बचाने हेतु:-
þ शिखर सम्मेलन (स्टॉक होम स्वीडन) – 1972
þ पर्यावरण दिवस – 5 जून
þ पृथ्वी दिवस – 22 अप्रैल
þ जल दिवस – 22 मार्च
þ क्युटो सम्मेलन (जापान) – 1997
þ प्रथम पृथ्वी सम्मेलन (ब्राजील रियोडिजेनेरिया) – 1992
þ ह्वितीय पृथ्वी सम्मेलन (न्यूयार्क) – 1997
þ तृतीय पृथ्वी सम्मेलन (जोहांसबर्ग) – 2002
लघु उत्तरीय प्रश्न :
1.
संसाधन को परिभाषित करें?
उत्तर- वे सभी वस्तुएँ जो मानवीय आवश्यकताओ की पुर्ति
करते है संसाधन कहलाते है| संसाधन भौतिक और जैविक दोनों होते
है और मानवीय जीवन को सुखमय बनाने में इन दोनो संसाधनों का महत्वपर्ण स्थान होता
है। प्रसिद्ध भूगोलविद “जिम्मरमैन” ने
कहा था कि संसोधन होते नहीं है बनाए जाते हैं।
2.
संभावी और संचित कोष संसाधन मे अंतर स्पष्ट करें?
उत्तर- संभावी संसाधन वैसे संसाधन होते हैं जो किसी क्षेत्र विशेष में
मौजूद होते है तथा जिसे उपयोग में लाए जाने कि संभावना होती है। जैसे- हिमालय
क्षेत्र का खनिज ।
वहीं संचित कोष संसाधन वें संसाधन होते है जिसे
तकनीक के आधार पर उपयोग किया जा सकता है परंतु अबतक इसका उपयोग नही किया गया है।
अर्थात् यह भविष्य की पूँजी है। जैसे-बौँधों में सिंचित जल।
3.
संसाधन संरक्षण की उपयोगिता को लिखें-
उत्तर- सभ्यता एवं संस्कृति के विकास में संसाधनों की
अहम् भूमिका होती है। किन्तु, संसाधनों का अविवेकपूर्णया
अधिक उपयोग विविध प्रकार के सामाजिक, आर्थिक,
सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देता हैं। इन
समस्याओं के समाधान हेतु विभिन्न स्तरों पर संरक्षण की आवश्यकता
हैं। संसाधनों का नियोजित एवं विवेकपूर्ण उपयोग ही
संरक्षण कहलाता हैं।
4.
संसाधन-निर्माण में तकनीक की क्या भूमिका हैं?
उत्तर- संसाधन निर्माण में तकनीक की अहम भूमिका होती
हैं। तकनीक के सहारे मानव ने ऐसे-ऐसे संसाधनों का विकास
कर लिया हैं जिसकी लोगों ने कल्पना तक नहीं की थी। आधुनिक संसाधन जैसे हवाई जहाज,
इन्टरनेट इत्यादि संसाधनों ने तकनीक के
माध्यम से हीं हमारे जीवन को सुलभ बना दिया है। अर्थात् संसाधन निर्माण में
तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण हैं।
दीर्घ
उत्तरीय प्रश्न
1.
संसाधन के
विकास में ‘सतत्’
विकास की अवधारणा की व्याख्या कीजिए :-
उत्तर- संसाधन
मनुष्य के जीविका का आधार हैं। जीवन की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए साधनों के सतत्
विकास की अवधारणा आवश्यक है। संसाधन प्रकृति-प्रदत्त
उपहार हैं कि अवधारणा के कारण लोगों ने इसका अंधा-धुन दोहन
शुरु किया, जिसके कारण पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न हो गई
है। व्यक्ति के लालच-लिप्सा ने साधनों का तीव्रत्तम
दोहन कर संसाधनों के भंडार में चिन्तनीय ह्रास ला दिया हैं। संसाधनों का
केन्द्रीकरण खास लोगों के हाथों में आने से दो स्पष्ट
भागों में (समपत्र एवं विपत्र) बँट गया हैं। सम्पन्न
लोगों द्वारा स्वार्थ के वशीभूत होकर संसाधनों का विवेकहीन दोहन किया गया। जिससे
विश्व परिस्थितिकी में घोर संकट की स्थिति, उत्पन्न हों गई हैं। भूमंडलीय तापन, ओजोन क्षय,
पर्यावरण-प्रदूषण, मृदा-क्षरण, भूमि-विस्थापन, अम्लीय ‘वर्षा,
असमय ऋतु-परिवर्तन जैसी , परिस्थितिकी-संकट
पृथ्वी पर व्याप्त सभ्यता-संस्कृति को निगल जाने को
तैयार है। यदि इन स्वार्थी तत्वों या देशों के द्वारा अनवरत-विदोहन चलता रहा
तों पृथ्वी का जैव संसार विनास के आगोश में समा जायेगा।
2.
स्वामित्व के आधार पर संसाधनों
के विभिन्न स्वरूप का वर्णन करें:-
उत्तर- स्वामित्व
के आधार पर संसाधन के चार प्रकार निम्नलिखित है :-
(i) निजी संसाधन- वैसा
संसाधन जो किसी खास व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में होता है।
जैसे- तालाब,
जमीन, घर इत्यादि।
(ii) सामुदायीक संसाधन– वैसा
संसाधन जो किसी खास समुह के नियंत्रण में होता है अर्थात् जिसका उपयोग किसी खास
समूह के लिए किया जाता है।
जैसे- मंदिर,
मस्जिद, गिरजाघर इत्यादि।
(iii) राष्ट्रीय संसाधन- वैसा
संसाधन जो किसी देश या राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में होता है और जिसका उपयोग
लोगों के हित के लिए होता है राष्ट्रिय संसाधन कहलाते है।
जैसे- कानूनी
तौर पर देश के सभी संसाधन राष्ट्रीय संसाधन हैं।
(iv) अंतराष्ट्रीय
संसाधन- वैसा संसाधन जिसमें अंतराष्ट्रीय संस्था का
अधिकार होता हैं, अन्तर्राष्ट्रीय संसाधन कहलाते है।
जैसे- समुद्री
तट से 200 किमी० के बाद का महासागरीय क्षेत्र।
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