राम नाम बिनु बिरथे जगी जनमा
भावार्थ-ः
गुरु नानक कहते है कि यदि हमने राम नाम का नाम नहीं लिया तो इस संसार में हमारा जन्म लेना व्यर्थ है द्य बिना राम नाम के हम केवल विष खाते है और हमारी वाणी विष के सामान होती हैद्य राम नाम के विना जीवन निष्फल है इसके बिना बुध्दि भ्रमित रहती है |
मनुष्य धर्म शास्त्रों कि चर्चा करता है समय निकालकर संध्या कालीन उपासना करता हैद्य लेकिन गुरु के सीख बिना प्राणी कि मुक्ति संभव नहीं हैद्य राम नाम के बिना मनुष्य उलझकर मर जाता हैद्य
मनुष्य दण्ड कमण्डल चोटी जनेऊ धोती धारण करता है तीर्थ गमन में भटकता रहता है। किन्तु राम नाम बिना उसे शांति नहीं मिलती है । जो हरी का नाम लेते है, वे इस संसार से मुक्ति पा सकते है ।
जटा धारण करना शरीर पर भसम लगाना, वस्त्र का त्याग करना सब व्यर्थ है इस संसार में जल-थल अथवा आकाश में जितने भी जीव है सब उन्ही के कृपा से जीवित हैद्य नानक जी कहते है कि उन्होंने हरिरस अर्थात इश्वर की भक्ति का पान पूर्ण रूप से कर लिया है ।
जो नर दुःख में दुःख नहीं माने भावार्थ
नानक जी कहते है, जो मनुष्य दुख में दुख नहीं होता हैद्य सुख स्नेह और भय से प्रभावित नहीं होता है, जो सोना को मिट्टी समझता है
जो निंदा और प्रशंसा को सामान भाव से लेता है जिसे न लोभ हो न मोह और नहीं अभिमान द्य जो हर्ष और शोक में एक सामान रहता है, जो मान अपमान से परे हो ।
जिसने शंशारिक इछाओ को अपने मन से त्याग दिया हो जिसके भीतर न कम उत्पन हो न क्रोध वैसे ही मनुष्य के शरीर में ब्रहम का निवास होता है ।
गुरु की कृपा जिन पर रहती है वे ही इस युक्ति को पहचान सकते हैद्य गुरु नानक जी कहते है कि वे गोबिंद में इस तरह लीन है, जैसे पानी में पानी ।
बोध और अभ्यास
कविता के साथ
1ण् कवी किसके बिना जगत में यह जन्म व्यर्थ मनता है ?
उत्तर - कवि राम नाम के बिना जगत में यह जन्म व्यर्थ मानता हैद्य जो व्यक्ति राम नाम का स्मरण नहीं करता है उसका इस संसार में जन्म लेना व्यर्थ चला जाता है द्य
2ण् वाणी कब विष के सामान हो जाती है ?
उत्तर -राम नाम के बिना हमारी वाणी विष के सामान हो जाती है अर्थात जो व्यक्ति राम नाम का भजन नहीं करता है, उसकी वाणी विष के सामान हो जाती है द्य
3ण् नाम दृ कीर्तन के आगे कवी किन कर्मो की व्यर्थता सिद्ध करता है ?
उतर - धर्मदृशास्त्रों की चर्चा करनाए अध्ययन करना, समय निकालकर संध्या कालीन उपासना करना आदि कर्म नाम कीर्तन के आगे व्यर्थ हैद्य राम नाम के बिना इस संसार से मुक्ति नहीं मिल सकती है द्य
4ण् प्रथम पद के आधार पर बताए कि कवी ने अपने युग में धर्म दृ साधना के कैसे दृकैसे रूप देखे थे ?
उतर - कवि के अनुसार धर्म दृ साधना के रूप इस प्रकार हैद्य व्यक्ति दण्ड, कमंडल, चोटी ,जनेऊ ,धोती धारण करता था, तीर्थ गमन करता था, जटा धारण करता था, तन पर भस्म लगाता था, वस्त्र आदि त्याग करता था द्य कवी अपने युग में धर्म दृ साधना के इसी रूप को देखो थे द्य
5ण् हरिरस से कवि का क्या अभिप्राय हैद्य
उतर -हरिरस से कवि का अभिप्राय ईश्वर कि भक्ति से हैद्य जो मनुष्य इश्वर की भक्ति से हैद्य पूर्ण रूप से लीन हो जाता है,इसको इस संसार से मुक्ति मिल जाती हैद्य
6ण् कवि की दृष्टी में ब्रहम का निवास कहां है ?
उतरः- जो मनुष्य दुःख में दुःख नहीं होता, जो सुख स्नेह और भय से प्रभावित नहीं होता,जो सोना को मिट्टी समझाता है जो निंदा और प्रशंसा को सामान भाव से लेता है , जिसे न लोभ हो और न अभिप्रय,जो हर्ष शोक , मान ,अपमान से परे हो जिसने सांसारिक इच्छाओं को अपने मन से त्याग दिया हो, जो काम और कोर्ध से परे हो वैसे ही मनुष्य के हृदय में ब्रहम का निवास होता है द्य
7ण् गुरु कि कृपा से किस युक्ति कि पहचान हो पाती है ?
उतर:- गुरु नानक का कहना है कि जिस मनुष्य पर ईश्वर कि कृपा हो जाती है द्य
वह संसारिक माया दृ जाल से मुक्त हो जाता है द्य उसकी आत्मा परमात्मा से मिल जाती है द्य उसके ह्दय में भगवान् का निवास हो जाती हैद्य
8ण् व्याख्या करे दृ
राम नाम बिनु अरुझी मरै द्य
उतर - प्रस्तुत पक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक के राम नाम बिनु बिरथे जगी जनमा शीर्षक कविता से ली गई है द्य इस कविता के कवि गुरु नानक है कवि का कहना है कि जो मनुष्य राम का नाम नहीं लेता है वह संसारिक माया जाल में उलझकर मर जाता है द्य उसको इस संसार से मुक्ति नहीं मिल पाती है द्य

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